राजीव गांधी : एक सच्चा युगद्रष्टा जो धूर्त राजनीति का शिकार हो गया

द न्यूज यूनिवर्स

राजीव गांधी जी को भारतीय राजनीति का जेंटलमैन कहा जाए तो गलत नहीं होगा। अपनी अल्पायु और उससे भी काफी कम राजनीतिक जीवन मे उन्होंने एक भी ऐसी टिप्पणी नहीं की जो अमर्यादित हो। सोचिए एक प्रधानमंत्री जिसका सबसे खास सिपहसालार उसके लिए षड़यंत्र रच रहा हो उसको भी उन्होंने एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया। आज वर्तमान समय में जहाँ नेताओं की भाषा 10 रुपये प्रति कॉमेंट वाले सस्ते ट्रोल जैसी हो चुकी है राजीव जी की सौम्य मुस्कान और सहज भाषा याद आती है।
सफेद कुर्ते पर करीने से लपेटी हुई लोई उनके चरित्र पर भी एक भीनी गर्माहट देती थी। राजीव जी ने अपने जीवन भर में जो भी रिश्ता निभाया उसे पूरी ईमानदारी से निभाया। चाहे वो सोनिया जी से प्रेम करने वाले राजनीति से कोसों दूर एक शांत पायलट का हो या अपने छोटे भाई की मृत्यु के बाद अपनी बुजुर्ग माँ को सहारा देकर पार्टी को संभालने वाले बड़े बेटे का हो। सोचिए उस व्यक्ति की मनोदशा जिसके सामने उसकी माँ का छलनी शरीर हो पर उसे वहाँ शोक मनाने के बजाए देश में हो रहे दंगे को शांत कराने की जिम्मेदारी मिले। इतने के बावजूद भी वो व्यक्ति रुकता नहीं है, अपने शोक अपनी भावनाओं को अलग रख कर वो देश की फिक्र करता है। आये दिन जिन्हें सुरक्षा एजेंसियां ये बताती हों कि उनकी जान को खतरा है तब भी वो व्यक्ति अनवरत अपने कामको जारी रखता है।
जब श्रीलंका में लिट्टे आतंकवाद चरम पर था तो अमेरिका को दक्षिण एशिया में अपने पैर जमाने का मौका मिला। राजीव जी के पास दो रास्ते थे पहला कि वो श्रीलंका में लिट्टे के खात्मे के लिए सहयोग करते और तमिल समुदाय से विरोध झेलकर राजनीतिक नुकसान झेलते दूसरा शांत बैठ कर अमेरिका को श्रीलंका में अपने पैर जमाने देते और भारत को कमजोर करते। राजीव जी ने पहला रास्ता चुना।
ऐसा करने पर उन्हें राजनीतिक आलोचना और विरोध का सामना करना पड़ा पर देशहित के आगे सब न्यौछावर। अंततः ये तमिल आतंकवाद ही भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री की मृत्य का कारण बनी पर उनके रक्त का एक एक कतरा इस देश की मजबूती के लिए समर्पित रहा।
राजीव जी को इंदिरा जी की मृत्य के बाद पार्टी और सरकार पर कब्जा करने की चाहत वाले कई नेताओं का सामना करना पड़ा। पर ऐसे में भी वो देश मे नवाचार के प्रयोग करने में नही चूके। देश मे प्रौद्योगिकी विकास में जो उनका योगदान है उसी कारण आज हम दुनिया भर में अपनी तकनीकी का लोहा मनवा रहे हैं। देश का पहला सुपर कम्प्यूटर भी उन्हीं के कार्यकाल में 1987 में बनना शुरू हुआ एक ओर जहाँ अमेरिका जैसे देश भारत को हिमाकत भरी नजरों से देख रहे थे ,भारतीय वैज्ञानिकों ने उस वक़्त एक दूरदर्शी प्रधानमंत्री के नेतृत्व में विश्व को अपनी क्षमता का लोहा मनवाया था।
राजीव जी हमेशा से ही नए विचारों के पक्षधर रहे थे यही कारण था कि युवाओं के मताधिकार की उम्र 18 साल कर उन्होंने भारतीय युवाओं को राजनीति में रुचि और भागेदारी लेने के लिए और प्रेरित किया।
आज जब नेता दूसरे देशों में जाकर अपने खर्चे पर वहाँ अपनी वाहवाही में प्रोग्राम करवाते हैं ऐसे में मुझे अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन का राजीव जी के पीछे छाता लेके चलना याद आता है। दिखावे और ओछी राजनीति से कोसों दूर एक शांत और सौम्य स्वभाव का नेता जिसका एकमात्र स्वप्न देशसेवा था जो लंबे लंबे वादों में नहीं बढ़े बढ़े कामों में यकीन रखता था। धन्य है मेरा देश जहाँ की मिट्टी ऐसे सपूत जनती है और अभागा भी की वो इतनी अल्पायु में ही देश पर प्राण न्योछावर कर गए।

अशोक गुप्ता

21 मई 2020