महात्मा गांधी और बंटवारे का जिन्न

द न्यूज़ यूनिवर्स

“अभिव्यक्ति एवम विचार “

“गांधीजी और बंटवारे का जिन्न”


हाल ही में बीते २ अक्टूबर को सोशल मीडिया में बड़ी ही अजीबोगरीब चीज़ सामने आयी वैसे तो, २ अक्टूबर महात्मा गाँधी के जन्मदिवस के रूप में तो मनाया ही जाता है साथ में विश्व अहिंसा दिवस के रूप में भी मनाया जाता है , पर इस २ अक्टूबर को नाथूराम गोडसे के द्वारा की गई महात्मा गाँधी की हत्या को ‘तथाकथित वीरता’ से सम्बोधित कर के ट्रेंड किया जाने लगा ,
कौन है नाथूराम गोडसे ? आज़ादी की लड़ाई में क्या योगदान है गोडसे का? क्या महात्मा गाँधी से एक ऐसे शख्स की तुलना करना उचित है, जिसके जीवन की एक मात्र उपलब्धि भी एक ‘महात्मा की हत्या ‘हो?
आमतौर पे गाँधी विरोधी , बापू का नाम सीधे बंटवारे से ऐसे जोड़ देते हैं , जैसे रैडक्लिफ गांधीजी के भाई हो? कई लोग सुभाष चंद्र बोस और महात्मा गाँधी की अनर्गल तुलना करते हैं । शायदउन्हें यह एहसास ही नहीं की महात्मा गाँधी को राष्ट्रपिता कह के सम्बोधित करने वाले सुभाष बाबू ही थे जिन्होंने ६ जुलाई १९४४ को फ़ोन करके आखिरी निर्णायक युद्ध के लिए बापू से आज़ाद हिन्द फ़ौज के लिए आशीर्वाद माँगा था l
बापु और बोस की तुलना कर के,आप बापू का अपमान तो करते ही हैं साथ में सुभाष बाबू जैसे साहसी कद्दावर नेता की भी सूजबूझ पे सवाल खड़े करते हैं।
माहत्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका से जनवरी१९१५ में भारत लौटे थे , लेकिन कुछ विद्वानों का ये भी मानना है की अगर गाँधी चाहते तो भारत पाकिस्तान का बंटवारा रुक जाता ?
शायद वो इस बात से एकदम वाकिफ़ नहीं की १९०९ में पास हुए मोर्ले मिंटो सुधार में मुसलमानो के लिए अलग निर्वाचक मंडल(seperate electorate) पास कर दिया गया , जिसे कांग्रेस ने कबूल लिया था l
१९०६ में मुस्लिम लीग की स्थापना नवाब सलीमुल्लाह,आगा खान और अन्य मुस्लिम नेताओ ने कर दी थी, और बंटवारे की नीव यहीं पड़ गई थी जब गाँधी हिंदुस्तान की राजनीती में सक्रिय तक नहीं थे? तो बंटवारे के लिए ज़िम्मेदार कैसे?
केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के छात्र रहमत अली ने जब पाकिस्तान का सपना सजोया था , और उसपे पैम्फलेट छपवाये थे तो क्या उसके लिए भी गांधीजी दोषी है?
गांधीजी पे दोषारोपण कर के हम किस सच से मुँह छिपाना चाहते हैं?
महात्मा गाँधी को महात्मा रबीन्द्रनाथ टैगोर ने चम्पारन सत्याग्रह के दौरान कहा था , हाँ वही रबीन्द्रनाथ टैगोर जिनके लिखे जन गण मन पे आज राष्ट्रवाद का बिगुल फूँका जाता है , क्या आप टैगोर और सुभाष बाबू के दिए हुए उपनामो और उसके सन्दर्भ पे अनुचित सवाल खड़ा करना सही समझते हैं?
गोला बारूद बन्दूक हर किसी नौजवान के बस की बात नहीं थी।।
शहादत और फांसी पे लटकना हर क्रांतिकारी के बस की बात नहीं थी , जिन्होंने ने ये रास्ता चुना उस हर एक क्रांतिकारी को मै नमन करता हूँ चाहे वो सूर्य सेन हो ,या भगत सिंघ, लेकिन महात्मा गाँधी ने हिंदुस्तान को अहिंसा का वो मार्ग दिया जिससे हर आम आदमी ,महिला ,बच्चा ,बूढा, नौजवान अपने आप को आज़ादी की पावन जंग में खुद को झोंक सके और आज़ादी की पूरी जंग के दौरान सबके अंदर ऊर्जा का भरपूर संचार बना रहे।
चाहे वो १९२० का ख़िलाफ़त- असहयोग आंदोलन हो या १९४२ को शुरू किया गया भारत-छोड़ो आंदोलन जिसमे महात्मा गाँधी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया था ,गान्धीजी ने पूरे भारत को यह सिखलाया की किस प्रकार संविधानिक व्यवस्था का उलंघन किये बिना , आम जनमानस को अधिक से अधिक संख्या में जोड़ के दुनिया की सबसे बड़ी ताकतो की नीव कैसे हिलायी जा सकती है l

महात्मा गाँधी पे बंटवारे का आरोप लगाने वाले क्या यह भूल जाते हैं की जब १९३२ में रामसे मैकडोनाल्ड ने ‘कम्युनल अवार्ड ‘ पास कर के , पिछडो को भी अलग निर्वाचन मंडल देने की घोषणा की थी तब इसी महात्मा ने येरवडा जेल में किस तरह सत्याग्रह किया था ?
ओर अंत में बाबा साहेब डॉ भीमराव आंबेडकर को पूना समझौते के लिए मनाया था ?

यादि गाँधी न होते तो क्या यह सम्भावना नहीं थी, की पिछड़े और अनुसूचित जाती के अधिकाँश लोग अपना धर्म परिवर्तित कर के बौद्ध और ईसाई बन जाते ? तब क्या देश एक और बंटवारे की तरफ नहीं बढ़ रहा था?

जब पूरी कांग्रेस बंटवारे के पक्ष में थी ,ज़ी हाँ सभी प्रिय महान नेता , तब एक मात्र शख्स जो इसके विरोध में था वो महात्मा गाँधी थे ,पर तब तक मुस्लिम लीग की कारस्तानियों से परिस्तिथि बहुत गंभीर हो चुकी थी।

अक्टूबर 2 ,1869 से अक्टूबर 2,2019 में क्या बदला ? हम आज़ाद भारत के नागरिक बने ।जी बने , और क्या बदला?
हम राष्ट्रपिता के हत्यारे का नमन करने लगे? जाने अनजाने में हम सुभाष और टैगोर की भी हत्या तो नहीं कर रहे?
जब पूरा देश १५ अगस्त १९४७ को आज़ादी का जश्न मन रहा था , तब महत्मा गाँधी बंटवारे से आहत होके भूख हड़ताल पे थे ,
जब बंगाल का नोआखाली दंगे की आग में भड़का हुआ था , तब महात्मा गाँधी ने वहां जा कर बढ़ते रक्तपात को अहिंसा से ही थामा था l
महात्मा गाँधी में अनगिनत खूबियाँ है, उनका सामाजिक आर्थिक दृष्टिकोण आज भी उतना ही उचित है जितना तब था । पर यह लेख बंटवारे के उस जिन्न के ऊपर है जिसके लिए उन्हें हमेशा कोसा जाता है।
साथ ही मैं यह भी स्पष्ट कर दू की मै हर उस क्रांतिकारी का सम्मान करता हूँ जिसने आज़ादी की जंग में बलिदान दिया , लेकिन मेरा दायरा बस सुभाष बाबू और भगत सिंह में सिमट नहीं जात, वो अशफाक उल्लाह, राम प्रसाद बिस्मिल ,रोशन सिंह , पुलिन दस ,प्रफुल्ला चाकी , सूर्यसेन ,कल्पना दत्त सबके लिए बराबर है।
मेरी धारणा सिनेमा देख के नहीं बनती
महात्मा गाँधी का विचार और आदर्श किसी हत्या से दबाये नहीं जा सकते क्युकी उनके हिसाब से राम राज्य के दो ही सूत्र थे सत्य और अहिंसा l
सत्य आपके सामने है , और यदि वाकई में राम राज्य की तरफ हमे बढ़ना है, तो कड़वा क्यों न हो उसे स्वीकरना तो पडेगा l
” अक्षय कुमार सिंह “

इस आलेख के लेखक अक्षय कुमार सिंह मूलतः गोरखपुर के निवासी हैं और वर्तमान में उत्तर प्रदेश सरकार में असिस्टेंट इंजीनियर के पद पर कार्यरत हैं। श्री अक्षय जी आज़ादी की जंग के अमर शहीद पूज्यनीय बंधू सिंह जी के वंशज है व राष्ट्रवादी विचारधारा से ओतप्रोत युवा हैं, अपने इस लेख में वो गांधी जी के राष्ट्रवाद और उनके हत्यारे को महिमामंडित करने वाली विचारधारा पर विचार रख रहे हैं।