सुकवि श्रीकांत जी की एक कविता

द न्यूज़ यूनिवर्स

झाँसी

9 सितंबर

लिखना चाहा था चाय वाले पर निबंध
पर वो तो चौकीदार हो गये
फिर सोचा अच्छे दिन पर ही कुछ लिखुँ
पर वे तो गायब हो गये
फिर सोचा देखता हूँ टू जी और स्पेक्ट्रम घोटालों
या जितने घोटाले गिनाए गये उन पर रोशनी डालूँ
पर उन पर तो कोई चर्चा ही नहीं
सोचा विदेशों में जमा काले धन की सुध ले लूँ
पर उस पर तो धूल पड़ गई
मंहगाई ये क्या चीज होती है भाई
इसका आपसे क्या वास्ता है
देखते नहीं आदमी का खून कितना सस्ता है
कहीं भी बहता है
अभी तो धारा में बहो
370 और 35A के हटने में खुश रहो
लगता है राष्ट्रधर्म पर ही कुछ लिखा जाए
क्योंकि अभी राष्ट्रवाद का ज्वार है
हो सकता है अगले चुनाव में राष्ट्रधर्म
मुद्दा रहे न रहे
क्यों कि जब चुनाव होते हैं
पुराने मुद्दे कब्र में सोते हैं

श्रीकांत